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रा꣣ये꣡ अ꣢ग्ने म꣣हे꣢ त्वा꣣ दा꣡ना꣢य꣣ स꣡मि꣢धीमहि । ई꣡डि꣢ष्वा꣣ हि꣢ म꣣हे꣡ वृ꣢ष꣣न् द्या꣡वा꣢ हो꣣त्रा꣡य꣢ पृथि꣣वी꣢ ॥९३

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स्वर-रहित-मन्त्र

राये अग्ने महे त्वा दानाय समिधीमहि । ईडिष्वा हि महे वृषन् द्यावा होत्राय पृथिवी ॥९३

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

रा꣣ये꣢ । अ꣣ग्ने । महे꣢ । त्वा꣣ । दा꣡ना꣢꣯य । सम् । इ꣣धीमहि । ई꣡डि꣢꣯ष्व । हि । म꣣हे꣢ । वृ꣣षन् । द्या꣡वा꣢꣯ । हो꣣त्रा꣡य꣢ । पृ꣣थिवी꣡इ꣢ति ॥९३॥

सामवेद » - पूर्वार्चिकः » मन्त्र संख्या - 93 | (कौथोम) 1 » 2 » 5 » 3 | (रानायाणीय) 1 » 10 » 3


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हिन्दी : आचार्य रामनाथ वेदालंकार

अगले मन्त्र में अग्नि नाम से जीवात्मा को सम्बोधित किया गया है।

पदार्थान्वयभाषाः -

हे (अग्ने) शरीरस्थ मन, बुद्धि, इन्द्रिय आदि देवों में अग्रणी हमारे जीवात्मन् ! हम (महे राये) प्रचुर सोना, चाँदी, विद्या, विवेक आदि धन को कमाने के लिए और (दानाय) उसके दान के लिए (त्वा) तुझे (समिधीमहि) प्रदीप्त-प्रबुद्ध करते रहें। हे (वृषन्) बली जीवात्मन् ! तू (द्यावापृथिवी) द्युलोक और भूलोक की (महे होत्राय) महान् होम के लिए (ईडिष्व) स्तुति कर, प्रशंसा कर। ये द्यावापृथिवी जगत् के हितार्थ सृष्टि-संचालन-यज्ञ में सर्वस्व-होम कर रहे हैं, इस रूप में उनके गुणों का वर्णन कर और उनसे प्रेरणा लेकर स्वयं भी परोपकारार्थ होम कर, यह भाव है ॥३॥

भावार्थभाषाः -

मनुष्यों को चाहिए कि अपने आत्मा को प्रबोधन देकर दानशील आकाश-भूमि से शिक्षा लेकर धनों के कमाने तथा दान देने में प्रवृत्त हों ॥३॥

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संस्कृत : आचार्य रामनाथ वेदालंकार

अथाग्निनाम्ना जीवात्मा सम्बोध्यते।

पदार्थान्वयभाषाः -

हे (अग्ने) देहस्थेषु मनोबुद्धीन्द्रियादिषु देवेषु अग्रणीभूत अस्मदीय जीवात्मन् ! वयम् (महे राये) विपुलाय धनाय, विपुलं स्वर्णरजतविद्याविवेकादिधनम् अर्जयितुमिति भावः, (दानाय) अर्जितं धनं सत्पात्रेभ्यो दातुं च (त्वा) त्वाम् (समिधीमहि) प्रदीपयेम, प्रबोधयेम इत्यर्थः। हे (वृषन्) बलवन् जीवात्मन् ! त्वम् (द्यावा-पृथिवी) द्युलोकं भूलोकं च (महे होत्राय) महते होमाय (ईडिष्व) स्तुहि, प्रशंस। द्यावापृथिवी इमे जगतो हिताय सृष्टिसञ्चालनयज्ञे सर्वस्वहोमं कुरुत इति तयोर्गुणान् वर्णय, ततः प्रेरणां गृहीत्वा स्वयमपि परोपकाराय होमं कुरु, इति भावः ॥३॥

भावार्थभाषाः -

मनुष्यैः स्वात्मानं प्रबोध्य दानशीलाभ्यां द्यावापृथिवीभ्यां शिक्षां गृहीत्वा धनानामर्जने दाने च प्रवृत्तिर्विधेया ॥३॥